Amar Bail

A plant of eternity

Quran Class I — قرآن کلاس ۱

Posted by Haris Gulzar on August 8, 2009

میں  نے  دو  دن  پہلے  قرانی  عربی  کا  ایک  کورس  شروع  کیا۔  جس  طریقے  سے  وہ  کورس  پڑھایا  جا  رہا  ہے  اور  قران  کی  گرائمر  سمجھائی  جا  رہی  ہے،  وہ  کورس  پڑھنے  کا  بہت  مزہ  آتا  ہے۔  یہ  کورس  صرف  ۱۰  دن  کا  ہے  اور  اس  کورس  کے  بعد  انشأاللہ  اتنی  عربی  ضرور  آجائے  گی  کہ  قران  پڑھ  کہ  اسے  حرف  بہ  حرف  سمجھ  سکیں۔  میں  نے  سوچا  کیوں  نہ  ہر  کلاس  میں  پڑھائی  گئی  تمام  باتیں  یہاں  لکھ  دی  جائیں  تاکہ  مجھے  بھی  فائدہ  ہوتا  رہے،  اور  ہر  پڑھنے  والا  بھی  کچھ  سیکھ  سکے۔  میں  اپنی  پوری  کوشش  کروں  گا  کہ  اسی  روانی  اور  تسلسل  سے  یہاں  لکھتا  رہوں  جس  طرح  ہمیں  کلاس  میں  پڑھایا  جا  رہا  ہے  انشأاللہ۔  مجھے  ان  پروفیسر  صاحب  کا  نام  بھول  گیا  ہے  جنہوں  نے  یہ  کورس  تشکیل  دیا  ہے،  مگر  اگر  کوئی  انکا  نام  جاننے  میں  دلچسپی  رکھتا  ہے،  تو  میں  انشأاللہ  ۲  یا  ۳  دن  میں  دوبارہ  پتہ  کر  کے  بتا  سکتا  ہوں  انشأاللہ۔

آج  ہم  پہلی  کلاس  سے  آغاز  کرتے  ہیں۔ ۔ ۔  کورس  کی  گہرائی  میں  جانے  سے  پہلے  کچھ  باتیں  نوٹ  فرما  لیں۔ ۔ ۔

۔۔۔ اس  ۱۰  دن  کو  کورس  میں  ہم  سورت  حجرات  پڑھیں  گے۔  یہ  مدنی  سورت  ہے  اور  قران  کی  ۲۴ ویں  سورت  ہے۔

۔۔۔ پہلی  تین  کلاسیں  خاصی  مشکل  لگیں  گی،  مگر  ان  تین  کلاسوں  کے  بعد  اگلی  سات  کلاسیں  انشأاللہ  بہت  آسان  لگیں  گی  کیوںکہ  جو  گرائمر  کے  اصول  ہم  شروع  میں  پڑھیں  گے،  وہی  بعد  میں  دہرائے  جائیں  گے۔

۔۔۔ قران  میں  ایک  اندازے  کے  مطابق  کل  ۸۶۰۰۰ (  چھیاسی  ہزار)  الفاظ  ہیں،  جن  میں  سے  ۹۶ (چھیانوے)  الفاظ  ایسے  ہیں  جنکی  کل  تعداد  ۲۲۵۰۰ (بائیس  ہزار  پانچ  سو)  بن  جاتی  ہے۔  یہ  ۹۶ (چھیانوے)  الفاظ  کافی  آسان  ہیں  اور  ان  کو  یاد  کرنے  سے  تقریباّ  قران  کا  ایک  چوتھائی  تو  ہمیں  یاد  ہو  جائے  گا  انشأاللہ۔  اس  کورس  کے  دوران  ہم  یہ  ۹۶  (چھیانوے)  الفاظ  بھی  یاد  کریں  گے۔

۔۔۔  اس  کورس  کے  دوران  ہم  زیر،  زبر  اور  پیش  پہ  زیادہ  دھیان  نہیں  دیں  گے۔  اسکی  وجہ  یہ  ہے  کہ  ہم  عربی  بولنا  یا  لکھنا  نہیں  سیکھ  رہے،  بلکے  صرف  پڑھنا  اور  سمجھنا  سیکھ  رہے  ہیں۔  ہمنے  اس  کورس  کے  بعد  عربی  کے  جملے  نہیں  بنانے   اسلئے  اس  کورس  کی  مدت  تک  زیر،  زبر  اور  پیش  پہ  زیادہ  دھیان  نہیں  دیا  جائے  گا۔

۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔

قران  کی  ایک  سورت  کے  علاوہ  باقی  تمام  سورتیں  بسم اللہ  سے  شروع  ہوتی  ہیں۔  آج  ہم  دیکھتے  ہیں  کہ  اس  آیت  کا  مطلب  کیا  ہے۔ ۔ ۔

بسم دو  لفظوں  کو  جوڑ  کر  بنایا  گیا  ہے۔  وہ  دو  لفظ  ہیں  ‘با’،  اور  ‘اسم’۔  یہ  دونو  لفظ  اردو  میں  عام  استعمال  کئیے  جاتے  ہیں۔  ‘اسم’  کے  معنی  ہیں  ‘نام’۔  جیسے  ہم  عموماّ  کہتے  ہیں  “آپکا  اسم  شریف  کیا  ہے؟”  یعنی  آپکا  نام  کیا  ہے۔  اسی  طرح  ‘با’  بھی  اردو  زبان  میں  استعمال  کیا  جاتا  ہے،  جیسے  ‘با  ادب’  یا  با  عزت۔  لفظ  با  کا  مطلب  ہے  ‘کے  ساتھ’۔  اکثر  عربی  زبان  میں  جب  دو  لفظوں  کو  جوڑا  جاتا  ہے  تو  انکے  درمیان  موجود  الف  کھا  لئے  جاتے  ہیں۔  یہاں  پر  بھی  یہی  کیا  گیا  ہے۔  با  اور  اسم  کو  جوڑ  کر  بسم  بنایا  گیا  ہے  جسکا  مطلب  ہے،  کے  ساتھ  نام۔

بسم  کے  بعد  اللہ  ہے  جس  سے  مطلب  بنا،  ‘کے  ساتھ  نام  اللہ’۔  یعنی  اللہ  کے  نام  کے  ساتھ۔  جس  طرح  قران  کی  ایک  سورت  کے  علاوہ  باقی  تمام  سورتیں  اللہ  کے  نام  سے  شروع  ہوتی  ہیں،  ہمیں  بھی  اپنا  ہر  کام  اللہ  کے  نام،  سے  شروع  کرنا  چاہئے۔  یہاں  ایک  بات  اور  نوٹ  فرما  لیں۔  کچھ  علماء  کہتے  ہیں  کہ  لفظ  اللہ  بھی  دو  الفاظ  کو  جوڑ  کر  بنایا  گیا  ہے۔  وہ  دو  الفاظ  ہیں  ‘ال’  اور  ‘الہ’۔  ‘ال’  کو  استعمال  کیا  جاتا  ہے  کسی  عام  چیز  کو  خاص  بنانے  کے  لئیے،  مثال  کے  طور  پر،  کتاب  کا  مطلب  ہوگا  کوئی  بھی  کتاب،  مگر  الکتاب  کا  مطلب  ہوگا  کوئی  ایسی  خاص  کتاب  جسکا  یا  تو  تمام  لوگوں  کو  پتہ  ہے،  یا  اسکا  ذکر  ہوچکا  ہے  اور  اسی  ذکر  کے  طحت  بات  کی  جا  رہی  ہے۔  اسی  طرح  لفظ  ‘الہ’  کا  مطلب  ہے  خدا  (کوئی  بھی  خدا)  ۔  تو  جب الہ  یعنی  کسی  بھی  خدا  کا  ذکر  ہو،  اور  اس  سے  پہلے  ‘ال’  لگ  جائے،  تو  وہ  ایک  خاص  خدا  یعنی  اللہ  کا  ذکر  بن  جائے  گا۔  تو  کچھ  علماء  یہ  بھی  کہتے  ہیں  کہ  اللہ  بھی  دو  الفاظ  کو  جوڑ  کر  بنایا  گیا  ہے۔ ۔ ۔

اب  ہم  گرائمر  کے  کچھ  مزید  اصول  پڑھتے  ہیں۔ اردو  میں  ہم  نے  پڑھا  تھا  کے  ایک  فعل  ہوتا  ہے،  ایک  ہاعل  ہوتا  ہے،  اور  ایک  مفعول  ہوتا  ہے۔  اسی  طرح  عربی  میں  بھی  ایک  لفظ  کی  یہ  تینو  حالتیں  ہو  سکتی  ہیں۔  ہم  دیکھتے  ہیں  کہ  کس  طرح  ایک  حالت  سے  لفظ  دوسری  حالت  اختیار  کرتا  ہے۔ ۔ ۔

فعل  ۔ ۔ ۔ ۔ ۔ ۔ فاعل ۔ ۔ ۔ ۔ ۔ ۔ ۔ ۔   مفعول

فعل  سے  فاعل  بنانے  کے  لئیے  ہم  نے  صرف  اتنا  کیا  کہ  پہلے  حرف  یعنی  ‘ف’  کے  بعد  اپنی  طرف  سے  ایک  ‘الف’  ڈال  دیا۔  اور  باقی  سب  کچھ  ویسا  ہی  رہنے  دیا۔  ایک  بات  نوٹ  کرنے  والی  یہ  ہے  کہ  عربی  زبان  میں  بیشتر  لفظ  صرف  تیں  حرف  سے  بنتے  ہیں۔  تو  اگر  پہلے  حرف  کے  بعد  الف  لگا  دیا  جائے  اور  باقی  دونو  حرف  ایسے  ہی  رہنے  دیئے  جائیں،  تو  فعل  سے  فاعل  بن  جائے  گا۔  فعل  ہوتا  ہے  کوئی  کام  کرنا،  اور  فاعل  ہوتا  ہے  وہ  کام  کرنے  والا۔  مثال  کے  طور  پر  اگر  ہم  لفظ  ‘قتل’  کو  دیکھیں،  جو  کہ  ایک  فعل  ہے،  تو  اسکا  فاعل  بنانا  بہت  آسان  ہے۔  صرف  پہلے  حرف  یعنی  ق  کے  بعد  الف  لگا  دیں۔  اور  باقی  دونو  حرف  الف  کے  بعد  ویسے  ہی  لگا  دیں۔  جو  لفظ  بنے  گا  وہ  ہی  قاتل۔  اسی  طرح  اگر  فعل  سے  مفعول  بنانا  ہو  تو  ہم  سب  سے  پہلے  اپنی  طرف  سے  ایک  م  کا  اظافہ  کرتے  ہیں،  اسکے  بعد  دو  حرف  ایسے  ہی  رہنے  دیتے  ہیں،  اور  پھر  آخری  حرف  سے  پہلے  ایک  و  کا  اظافہ   کرتے  ہیں۔  اگر  قتل سے  مفعول  بنانا  ہو،  تو  سب  سے  پہلے  م،  پھر  دو  حرف  جس  طرح  تھے  اسی  طرح  یعنی  ق  اور  ت،  پھر  ایک  و  اور  پھر  آخری  حرف۔  اس  طرح  بنے  گا  مقتول۔

کچھ  اور  مثالیں  دیکھتے  ہیں

فعل  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  فاعل  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  مفعول

طلب  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  طالب  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  مطلوب

حمد  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  حامد  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  محمود

خلق  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  خالق  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  مخلوق

رحم  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  راحم  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  مرحوم

حکم  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  حاکم  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  محکوم

نصر  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  ناصر  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  منصور۔ ۔ ۔

امید  ہے  کہ  فعل  سے  فاعل  اور  مفعول  بنانے  کا  طریقہ  آپکو  آگیا  ہوگا۔  جیسے  جیسے  ہم  آگے  پڑھیں  گے،  یہ  چیزیں  اور  بھی  آسان  ہو  جائیں  گی  انشأاللہ۔  اب  ہم  کچھ  مزید  گرائمر  پڑھتے  ہیں۔

جس  طرح  ہم  نے  فاعل  اور  مفعول  پڑھا،  اسی  طرح  عربی  میں  فعل  کی  دو  مزید  حالتیں  ہوتی  ہیں۔  یہ  حالتیں  ہیں  فعلان  اور  فعیل۔  ہمیں  یہ  تو  پتہ  ہی  ہے  کہ  فاعل  وہ  ہوتا  ہے  جو  فعل  کرے،  اسی  طرح  فعلان   بھی  اسی  شخص  کو  کہتے  ہیں  جو  فعل  کرے،  فرق  صرف  اتنا  ہے  کہ  فاعل  جب  فعل  کرتا  ہے،  تو  اس  میں  جوش  اور  ولولہ  نہیں  ہوتا،  مگر  فعلان  جب  فعل  کرتا  ہے  تو  شدّت  سے،  جوش  اور  ولولے  سے  کرتا  ہے۔  یعنی  اگر  ہم  نے  ایسے  فاعل  کا  زکر  کرنا  ہو  جسنے  کوئی  فعل  بہت  جوش  اور  شدّت  سے  کیا  ہو،  تو  ہم  اس  فاعل  کو  فعلان  کہتے  ہیں۔  اسی  طرح  فعیل  بھی  فعل  کرنے  والا  ہوتا  ہے  مگر  وہ  ایسا  فاعل  ہوتا  ہے  جو  ازل  سے  ابد  تک  وہ  فعل  کرے۔  یعنی  جس  فعل  کو  کرنے  میں  وقت  لامحدود  ہو۔  وہ  فعل  ہمیشہ  کیا  جاتا  رہے۔

فعل  سے  فعلان  بنانا  بھی  بہت  اصان  ہے،  صرف  فعل  کے  آخر  میں  الف  اور  ن  لگانا  ہے۔  اسی  طرح  فعل  سے  فعیل  بنانے  کے  لئیے  آخری  حرف  سے  پہلے  چھوٹی  ی  لگانی  ہے۔  ہم  اسکی  بھی  کچھ  مثالیں  دیکھتے  ہیں۔ ۔ ۔

فعل  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  فعلان  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  فعیل

قتل  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  قتلان  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  قتیل  (قتلان  وہ  شخص  ہوگا  جو  بہت  جوش  اور  ولولے  سے   قتل  کرے۔  اور  قتیل  وہ  شخص  ہوگا  جو  ازل  سے  لیکر  ابد  تک،  ہمیشہ  ہمیشہ  قتل  کرتا  رہے۔  عربی  میں  قتل  کا  مطلب  لڑنا  ہوتا  ہے)۔

رحم  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  رحمان  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  رحیم  (رحمان  کا  مطلب  ہوگا  جو  بہت  شدت  اور  جوش  سے  رحم  کرے،  اور  رحیم  کا  مطلب  ہوگا  جو  ہمیشہ  ہمیشہ  رحم  کرتا  رہے)۔

نصر  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  نصران  ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔  نصیر  (  نصران  کا  مطلب  ہوگا  جو  بہت  جوش  سے  اور  ولولے  سے  مدد  کرے،  اور  نصیر  کا  مطلب  ہوگا  جو  ہمیشہ  مدد کرتا  رہے)۔

اب  ہم  واپس  اپنی  پہلی  آیت  یعنی  بسم اللہ  الرحمن  الرحیم  کو  دیکھتے  ہیں۔

بسم اللہ  کا  مطلب  کے  ساتھ  نام  اللہ،  یعنی  اللہ  کے  نام  کے  ساتھ۔  الرحمن  دو  الفاظ  کو  جوڑ  کر  بنایا  گیا  ہے،  ال  اور  رحمان۔  رحمان  تو  ہم  نے  ابھی  دیکھا  کہ  بہت  شدت،  جوش  اور  ولولے  سے  رحم  کرنے  والے  کو  کہا  جاتا  ہے،  اور  ہم  نے  شروع  میں  پڑھا  تھا  کہ  اگر  کسی  لفظ  سے  پہلے  ال  لگا  دیا  جائے  تو  وہ  عام  چیز  کو  خاص  بنا  دیتا  ہے،  جسکا  یا  تو  ہم  سم  کو  پتہ  ہوگا،  یا  پیچھے  اسکا  زکر  ہو  چکا  ہوگا۔  رحمان  سے  پہلے  ال  لگانے  کا  مطلب  ہے  کہ  کوئی  ایسا  شدت  سے  رحم  کرنے  والا  جسکا  ذکر  پہلے  ہو  چکا  ہو،  اور  وہ  ہے  اللہ  جسکے  نام  کے  ساتھ  ہم  نے  یہ  آیت  شروع  کی  تھی۔  تو  بسم اللہ  الرحمن  کا  مطلب  ہوا  کے  ساتھ  نام  اللہ  بہت  شدت  اور  جوش  سے  رحم  کرنے  والا۔  یعنی  اللہ  کے  نام  کے  ساتھ  جو  بہت  رحم  کرنے  والا  ہے۔  اسی  طرح  ہم  رحیم  کا  مطلب  بھی  دیکھ  چکے  ہیں،  رحیم  کا  مطلب  ہے  ازل  سے  ابد  تک،  ہمیشہ  ہمیشہ  رحم  کرنے  والا۔   تو  پوری  آیت  کا  مطلب  بنے  گا  “اللہ  کے  نام  کے  ساتھ  جو  بہت  شدت  سے  رحم  کرتا  ہے  اور  ہمیشہ  ہمیشہ  رحم  کرتا  ہے”۔

امید  ہے  ااوپر  کی  گئی  باتیں  آپکو  کافی  حد  تک  سمجھ  آگئی  ہونگی۔  اگر  کچھ  تھوڑا  بہت  نہیں  بھی  سمجھ آیا  تو  انشأاللہ  جب  ہم  اگلی  کلاس  میں  مزید  آیتیں  دیکھیں  گے  تو  سمجھ  آجائے  گا۔  میں  نے  اوپر  ۹۶  چھیانوے  الفاظ  کا  ذکر  کیا  تھا  جو  ہم  انشأاللہ  اس  کورس  میں  یاد  کریں  گے۔  آج  کے  لئیے  آپکو  ۶  چھہ  الفاظ  بتا  رہا  ہوں۔  یہ  چھہ  الفاظ  بہت  آسان  ہیں  اور  قرآن  میں  بار  بار  آئے  ہیں۔  ان  میں  سے  چار  الفاظ  الف  اور  ن  سے  شروع  ہوتے  ہیں،  صرف  زبر  اور  زیر  کا  فرق  ہے۔

اَنَّ  ۔ ۔ ۔ ۔ ۔   بےشک

اِنَّ  ۔ ۔ ۔ ۔ ۔   بےشک

اَن  ۔ ۔ ۔ ۔ ۔  کہ

اِن  ۔ ۔ ۔ ۔ ۔  اگر

پہلے  دو  لفظ  میں  ن  کے  اوپر  شد  ہے  اور  زبر  ہے،  اور  پہلے  لفظ  میں  الف  کے  اوپر  زبر  ہے  اور  دوسرے  لفظ  میں  الف  کے  نیچے  زیر  ہے۔  پہلے  دونو  الفاظ  کا  مطلب  ہے  بےشک۔

اگلے  دونو  الفاظ  میں  ن  کے  اوپر  جزم  ہے۔  تیسرے  لفظ  میں  الف  کے  اوپر  زبر  ہے  اور  چوتھے  لفظ  میں  الف  کے  نیچے  زیر  ہے۔  تیسرے  لفظ  کا  مطلب  ہے  کہ  اور  چوتھے  لفظ  کا  مطلب  ہے  اگر۔

پانچواں  لفظ  جو  ہم  پڑھیں  گے  وہ  ہے    ‘یا’۔  یہ  لفظ  اردو  میں  بھی  استعمال  ہوتا  ہے،  جیسے  یا  حارث،  یا  عثمان۔  یہ  لفظ  ہم  کسی  کو  بلانے  کے  لئے  استعمال  کرتے  ہیں۔  اسکا  مطلب  ہے  اے۔  یعنی  اے  حارث،  اے  عثمان۔

اور  چھٹا  لفظ   جو  ہم  دیکھیں  گے  وہ  ہے  ایھا۔  اس  لفظ  میں  ی  کے  اوپر  پیش  ہے  مگر  مجھے  بہت  ڈھونڈنے  کے  باوجود  پیش  نہیں  مل  رہی۔   ی  کے  اوپر  شد  بھی  ہے۔  اس  لفظ  کا  مطلب  بھی  ہے  اے۔  یعنی  دونو  الفاظ  کا  ایک  ہی  مطلب  ہے۔  اکثر  قرآن  میں  یہ  دونو  لفظ  اکھٹے  استعمال  ہوتے  ہیں  جو  زور  ڈالنے  کے  لئے  کیا  جاتا  ہے۔

قران  اصل  میں  ایک  خطاب  کی  شکل  میں  ہے،  اسلئے  اکثر  جگہ  ہم  دیکھیں  گے  کہ  کسی  نہ  کسی  کو  مخاطب  کیا  گیا  ہوگا۔  یا  ایمان  والوں  کو،  یا  اہلِ  کفر  کو،  یا  تمام  انسانوں  کو،  یا  کسی  خاص  قوم  کو۔  سورت  حجرات  بھی  اسی  طرح  کے  ایک  خطاب  سے  شروع  ہوتی  ہے۔  انشأاللہ  اگلی  کلاس  میں  ہم  کچھ  مزید  گرائمر  اور  سورت  حجرات  کی  کچھ  آیتیں  دیکھیں  گے۔  اللہ  ہمیں  قران  سمجھنے  اور  اس  پہ  عمل  کرنے  کی  توفیق  عطا  فرمائے۔  آمین

16 Responses to “Quran Class I — قرآن کلاس ۱”

  1. If anyone is interested in english explanation of the Quran classes, I can give that a try as well. I started it in Urdu because that’s the language I’m being taught in.

    You can ask any questions you have, or any confusions you find. I’d really appreciate your comments/suggestions/feedback. Thank you

  2. […] This cup of tea was served by: Amar Bail […]

  3. kaka belly said

    good information

  4. @Kaka Belly: Thank you and Welcome to Amar Bail.

  5. Assalamoalaikum,

    JazakAllah Haris , may Allah give you the rewards for this. InshaAllah I will be reading more about this, is there another entry on this on your blog? Alhamdolillah yeh lesson mujhe already poora ata ha😀

    strange I am also doing a course these days, Alhamdolillah.

  6. Asad Ali said

    Amin Sum AMin

    Jazaka’llah ..Allah Pak Ajar day Amin

    Koi shak nahi kay Quran majeed behtareen hadayat hay …Aur sab se achi baat yeh hay kay Quran majeed ko Tarjama k sath parha jaye takay Mahni(meanings) samaj mein aa sakein..afsoosnaak baat yeh kay kay hum loag sirf Qrabi parhnay aur Sawab kamany k chakar mein hein lag gaye hein jeb k zaroorat iss amar ki hay kay Quran ko samajha jaye aur uss per amal kia jaye…

    Quran Pak k ek ek lafaz mein bohat gehrayee hay ..aur Alhamdulilah waqai yeh wo kitab hay jis jaysa ek lafaaz be koi nahi likha sakta aur Allah pak nein uss ki hifazat ka zima liya hay ..
    Allah Pak hum sab ko Quran majeed parhnay, samajnay aur uss per amal kernay ki toufeeq atta keray ..Amin Sum Amin..

  7. Asad Ali said

    Qrabi * Arabi*

  8. @Alhamdolillah: Thats great Masha-Allah. I’ll be posting further lectures soon Insha-Allah. Do pray that Allah keeps me steadfast and motivated to post lectures here Insha-Allah. Hoping to learn from you a lot. And welcome to Amar Bail.

    @Asad: Ameen to your prayers brother. You’re so very right. Each word of Quran is so deep and it really really feels great when you find yourself able to break Arabic words into its constituents and derive meanings out of them to form the complete meanings of the word. I’d Insha-Allah be posting other lectures. Do keep visiting.

  9. Qasim said

    Keep the good work up🙂

  10. @Qasim: Thank you🙂

  11. д§mд said

    Very nice🙂

    You narrated the whole class very well .. there were a few things which were totally new to me like faylaan and fayeel. Jazak Allah

    ps: For pesh, shift + P is the shortcut key🙂

  12. д§mд said

    pps: try shift + a few keys .. you’ll find plethora of things😀

  13. @Asma: Jazakallah for appreciating. And thanx for pointing out the pesh character🙂. I tried but somehow missed out on Shift+p and couldn’t find the pesh. Thank you so very much.

  14. […] کلاس  اول […]

  15. […] کلاس  اول […]

  16. […] کلاس  اول […]

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